Wednesday, June 19, 2013

इतिहास

संस्थापना :

कार्पोरेशन बैंक की संस्थापना 12 मार्च 1906 को केनरा बैंकिंग कार्पोरेशन (उडुपि) लिमिटेड के नाम से उडुपि की मंदिर-शहर में क्रान्तदर्शियों के एक समूह के पुरोगामी प्रयत्नों से हुई। बैंक ने अपना प्रारंभ रु 5000/- किया तथा पहले दिन की समाप्ति पर संसाधन 38 रुपए 13 आना 2 पाई था।

लोगों की दीर्घकालिक बैंकिंग आवश्यकताओं को पूरा करने तथा बचत की आदत भी डालने के लिए प्रतिबद्ध संस्थापक अध्यक्ष खान बहादूर हाजी अब्दुल्ला हाजी कासिम साहेब बहादूर ने समाज में समृद्धि लाने वाली वित्तीय संस्था की संस्थापना पर अत्यधिक जोर दिया।

जनता को 19 फरवरी, 1906 को की गई पहली अपील में इस संस्थापना के पीछे जो उच्च आदर्श तथा दर्शन थे, उनके संबंध में विस्तार से बताया गया है। संस्थापक अध्यक्ष हाजी अब्दुल्ला ने घोषित किया कि "'कार्पोरेशन' की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जाति या धर्म के भेद-भाव के बिना सभी श्रेणियों के लोगों में बचत की ही नहीं बल्कि सभी श्रेणियों में आपसी सहयोग की आदत डालना भी है।" यह शुद्ध व सरल 'स्वदेशीभावना' से ओतप्रोत है तथा प्रत्येक देशप्रेमी से इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे आते हुए सहयोग करने की अपेक्षा है।"

बाद के दिनों में :

प्रारंभिक संवृद्धि में जानबूझकर सावधानी बरती गई जो आवश्यकता आधारित थी। बैंक की पहली शाखा कुंदापुर में 1923 में खोली गई, तत्पश्चात् मंगलूर में 1926 में दूसरी शाखा खोली गई। बैंक ने 1934 में मडिकेरी में अपनी सातवीं शाखा खोलते हुए तत्कालीन कूर्ग राज्य में कदम रखा। बैंक को 1937 में भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल किया गया था।

सभी के लिए समृद्धि :

1939 में बैंक का नाम केनरा बैंकिंग कार्पोरेशन (उडुपि) लिमिटेड से "केनरा बैंकिंग कार्पोरेशन लिमिटेड" में परिवर्तित किया गया तथा आदर्श वाक्य-"सर्वे जना: सुखिनो भवंतु" जिसका अर्थ है " सभी जन सुखी रहे " को अपने दर्शन के रूप में पेश किया गया।

बैंक के नाम में दूसरा परिवर्तन "केनरा बैंकिंग कार्पोरेशन लिमिटेड" से "कार्पोरेशन बैंक लिमिटेड" 1972 में हुआ तथा 15 अप्रैल, 1980 को बैंक के राष्ट्रीयकरण के बाद "कार्पोरेशन बैंक " हो गया।

राष्ट्रीय लक्ष्यों की जिम्मेदारी लेना :

बैंक ने पूर्ण उत्साह से राष्ट्रीयकरण की प्राथमिकताओं का बीडा उठाया तथा अपने निष्पादन उन्मुख संस्कृति तथा लाभ वृद्धिकारी परम्परा को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय उद्देश्यों को पूरा करने में सफल हुआ है। इन सब के बीच में वर्ष 1985 में बैंक ने रु 1000 करोड-जमा का लक्ष्य पार किया तथा 1990 से नई प्रौद्योगिकी को अपनाते हुए उच्च गुणवत्तायुक्त संवृद्धि पर ध्यान केंद्रित करना प्रारंभ किया।

भारत में बैंकिंग क्षेत्र सुधार के प्रथम चरण की समाप्ति में बैंक आस्ति गुणवत्ता, पूँजी पर्याप्तता, परिचालनगत सक्षमता, सुविविधीकृत आय आधार, लाभप्रदता, उत्पादकता तथा सुदृढ़ तुलन पत्र में अन्य बैंकों से आगे बढ़ते हुए सार्वजनिक क्षेत्र में सबसे नवोन्मेषी तथा सक्रिय बैंक के रूप में उभर रहा है।

सामान्य रूप से जनता तथा विशेष रूप से ग्राहकों द्वारा दर्शाए गए अपार आत्मविश्वास तथा वफ़ादारी के कारण वर्ष 1997 में बैंक के प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव की अच्छी प्रतिक्रिया रही ।

बडी लीग में ऊँची छलाँग :

31 मार्च, 2010 को बैंक ने कुल कारोबार रु 1,55,936 करोड पार किया जबकि निवल लाभ में रु 1170.25 करोड तक की वृद्धि हुई। कुल जमा रु 92,733.67 करोड रही तथा कुल अग्रिम रु 63,202.56 करोड रहा। निवल मालियत में रु 5,775 करोड तक की वृद्धि हुई तथा निवल गैर निष्पादक आस्ति 0.31% तक कम हो गई।

विस्तार के साथ निकटता

दुबई तथा हाँगकाँग में बैंक के प्रतिनिधि कार्यालय हैं। संप्रति बैंक का देश भर में 1155 पूर्णत: स्वचालित सीबीएस शाखाओं, 1145 एटीएमों तथा 1200 शाखारहित बैंकिंग इकाइयों का नेटवर्क है। बैंक ने अगले पाँच वर्षों में 700 नई शाखाएँ खोलने की योजना भी बनाई है।

बैंक ने 1200 गाँवों में शाखारहित बैंकिंग इकाइयाँ प्रारंभ की है तथा इन गाँवों के सभी खाताधारकों को स्मार्ट कार्ड जारी किया है ताकि वे बैंक द्वारा नियुक्त कारोबार साथी के द्वारा अपनी दहलीज पर अपने खाते परिचालित कर सकें।

38 रुपए 13 आना 2 पाई से रु 1,55,936 करोड तथा रु 5,000 की निवल मालियत से रु 5,775 करोड, निधि से अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के रूप में परिवर्तन तथा स्वदेशी भावना के प्रारंभिक दिनों से उदारीकरण के बाद के इन दिनों तक की यात्रा व दो विश्व युद्धों, आर्थिक मंदियों से गुज़रते हुए अद्यतन प्रौद्योगिकी को आत्मसात कर वित्तीय सुधारों के अनुरूप कार्य निष्पादन तथा 1906 के समारंभ से अब तक अनवरत लाभ दर्ज करने की अनन्य परम्परा कार्पोरेट सफलता की गाथा है ।